Joshi Sir Ke Saath Pehli Chudaai-3

Discussion in 'Hindi Sex Stories' started by 007, Dec 21, 2017.

  1. 007

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    परंतु अब कुछ दस सालों से
    श्रीमती जोशी ने उन्हें साफ़
    कह दिया था की उनकी इस तरह
    जानवरों जैसे लगातार
    सम्भोग करने में कोई
    दिलचस्पी नहीं है, उनका मन
    पूजा पाठ की तरफ लगने लगा था.
    उन्होंने बिना बोले कह दिया
    की जोशी जी अपना इंतज़ाम
    चाहें तो बाहर से कर सकते
    हैं, बशर्ते की वो ऐसा
    चुपचाप ही करें. उनकी बीवी
    उनको प्यार तो करती थे पर
    उनकी जिस्मानी ज़रूरतों की
    उन्हें परवाह नहीं थी. यही
    शायद मेरी खुशकिस्मती थी!

    जोशी सर की उम्र 52 साल थी, और
    वो एक सरकारी कार्यालय में
    सुपरिन्टेन्डेन्ट थे. उनके
    दो बेटे थे, जो कॉलेज में
    पढ़ते थे. मूल रूप से
    हल्द्वानी के निवासी थे, पर
    अब कई दशकों से नौकरी के
    कारण परिवार समेत दिल्ली ही
    शिफ्ट हो गए थे. सरकारी आवास
    में परिवार समेत रहते थे. और
    सच में घर पर वो गर्मियों
    में लुंगियां या तहमद ही
    बांधना पसंद करते थे.

    हमने फोटो एक दुसरे को भेजे.
    पहले मैंने, फिर उन्होंने
    अपना फेस का और एक और बिना
    चेहरे के ऊपरी शरीर का फोटो
    भेज दिया. देखने में वो
    साधारण उत्तर भारतीय पुरुष
    जैसे लगते थे. पतले, गोरे,
    पतली काली सफ़ेद मूछें, करीब
    5'5″ कद. पेट बिलकुल बाहर नहीं.
    सर पर बाल थे, जो अब करीब 50-60%
    सफ़ेद थे. मुझे वो, उनकी फोटो
    देखने के बाद बिलकुल अपने
    मुनाफ़िक़ लगे. मुझे ऐसे ही
    मर्दाने लगने वाले पर
    साधारण पुरुष की तलाश थी, जो
    ऊपर से नार्मल हों, और अंदर
    से ठरकी ताऊ, सेक्स के
    दीवाने. फिर चाहे वो सेक्स
    लडके से मिले या फिर लड़की
    से.

    अरे माफ़ कीजिये. मैंने अपने
    बारे में तो आपको बताया ही
    नहीं. मेरी हाइट 5'8″ है, रंग
    सांवला, चेहरे पर मूछें,
    छाती पर बाल. मैं भी पतला
    हूँ, पर शहर के कसरत न करने
    वाले लड़कों जैसा पतला. जोशी
    जी का बदन मुझे मेहनत करने
    की वजह से जैसा कसा हुआ और
    पतला होता है, वैसे लगा.
    देखने में में भी बुरा नहीं
    था (मेरी नारी मित्र कहती
    थीं की मैं हैंडसम हूँ).
    परंतु जब मैंने जोशी जी को
    फोटो भेजे तो उन्होंने
    सिर्फ यह कहा की, "तुम्हारे
    होठ अच्छे हैं, रसीले. लण्ड
    पे लिपटे हुए पूरा मज़ा देना,
    ठीक है?"

    धीरे धीरे मेरे मन की प्यास
    ने मेरी स्वाभाविक झिझक पर
    विजय पा ही ली. जोशी-जी के
    पास तो मिलने की जगह का सवाल
    था ही नहीं, मैं भी दिल्ली
    में बुआ के घर पर एक रूममेट
    के साथ शेयर करता था. मेरा
    रूम का साथी अजमेर से था, सो
    त्योहारों में हम दोनों घर
    जाते थे. पर एक बार एक लंबे
    वीकेंड पर वो तो घर गया, और
    में रुक गया की इस बार जोशी
    सर से मिल कर ही रहूँगा.

    पहले मैंने उनसे कहा की
    कहीं बाहर मिलते हैं. पर
    उन्होंने समझाया, की जब
    चुसवाई के लिए ही मिलना है
    तो समय क्यों बर्बाद करना.
    घर पर ही बात कर लेना, और परख
    लेना. फोटो तोह तुम देख ही
    चुके हो.

    मैंने कहा, और में अगर आपको
    पसंद नहीं आया तो? उनका जवाब
    सीधा सरल था, "पसंद क्यों
    नहीं आओगे? तुम्हारे पास
    मुंह और गांड नहीं है क्या?
    मुझे तो सिर्फ गेम बजाने और
    बीज गिराने से मतलब है."

    मैं थोड़ा सकपकाया.. यह गांड
    कहाँ से बीच में आ गयी सर?
    मैंने पूछा. वो हँस के बोले,
    "अरे यार, तुम बहुत भोले हो.
    मिलो तो. सब विस्तार से
    बिस्तर पर ही समझा दूंगा."
    मैंने कहा, "आप लुंगी पेहेन
    के ही चुसवाओगे न?". वो हँस के
    फिर बोले, "तुम बोलो तो लुंगी
    पेहेन के ही गाडी चला कर के आ
    जाऊंगा. चिंता मत कर, तुम्हे
    पूरी सटिस्फैक्शन भी दूंगा,
    और फुल ट्रैन भी कर जाऊँगा."

    मुझे थोड़ा अजीब लगता था की
    उनकी बातों में कहीं प्यार,
    संबंधों, रिश्तों की बातें
    नहीं हैं. सिर्फ चुदाई, चाटन,
    बजाना-बजवाना, पेलना, मारना,
    ऐसे ही शब्द थे. पर में भी
    अपने प्यासे मन की तड़प से
    परेशान, उनकी इन्हीं बातों
    में बहता चला गया.

    फिर आखिर वो दिन आ ही गया.
    हमने रविवार के दिन, सुबह १०
    बजे का टाइम पक्का किया,
    क्योंकि हमारी नौकरानी तब
    तक चली जाती थी. उन्होंने भी
    घर पर कह दिया की आज ऑफिस में
    काम है, संडे को जाना पड़ेगा.
    और आते आते शाम हो जाएगी.
    उस दिन में खूब अच्छे से
    नहाया धोया. झांटों के बाल
    साफ़ किये. उनका ख्याल आते ही
    लुंड खड़ा हो जाता. और नै
    दुल्हन की तरह शर्म भी आ
    जाती. अभी तक सिर्फ पिक्चर
    ही देखि थी उनकी. आज दर्शन
    होने वाले थे. और वो मेरा भोग
    लगाने वाले थे. मन में कैसे
    कैसे अरमान थे.

    जोशी सर मेरी कॉलोनी में
    पहुँच कर फ़ोन करने वाले थे.
    पर देल्हते ही देखते दस बज
    गए , फिर साढ़े दस. उनकी कोई
    खबर नहीं थी. में मायूस सा
    बैठ गया. समझ नहीं आ रहा था
    की फ़ोन करूं, कहीं वह ड्राइव
    तो नहीं कर रहे होंगे.

    करीब ग्यारह बजे फ़ोन बजा.
    मेरे दिल ने कलाबाज़ी खाई.
    वही थे.
    "हाँ भाई, मैं आ गया गेट पर.
    कहाँ आऊं?" मैंने उन्हें
    नंबर बताया और बाहर पहुँच
    गया. गाडी पार्क कर के वो
    बाहर निकले. मेरा दिल धक्
    धक् कर रहा था. वो काफी स्लिम
    एंड ट्रिम थे और कड़क लगने
    वाले पुरुष थे. देखने में
    आकर्षक. मुझे देख के
    मुस्कुराये. बोले, चलो आज
    मिलना भी हो गया. तुम तो काफी
    शर्मीले हो यार.

    हम घर की तरफ चलने लगे ही थे
    की वो बोले, "अरे कुछ गाडी
    में रह गया". रिमोट चाबी से
    कार खोली और मुझे बोले,
    "पीछे वाली सीट पे एक पैकेट
    है. ले आ". मैं बिन समझे गाडी
    तक गया, और एक प्लास्टिक बैग
    उठाया. अंदर ऐसे लगा जैसे
    कुछ कपडा है, तह किया हुआ.
    मैं ला कर उनको देने लगा, तो
    वो बोले, "ये तो तेरे लिए है
    जानेमन."

    मुझे समझ नहीं आया, पर
    पड़ोसियों से बचने के लिए
    जल्दी से उन्हें घर ले आया,
    और दरवाज़ा बंद किया. वो सोफे
    पे बैठे और मैंने पानी ला के
    दिया. अब उन्हें अच्छे से
    देखा. आधी बाजू की सफ़ेद कमीज
    और सलेटी रंग की पैंट में,
    चश्मा लगाए, वो एक अध्यापक
    जैसे दिख रहे थे. सुन्दर
    चेहरे पर सफ़ेद मूछें. मेरी
    पैंट मैं उन्हें देख के
    फुरफुरी होने लगी.

    वो भी पानी पीते हुए मुझे
    देख रहे थे. फिर मुस्कुरा के
    बोले, "तू तो काफी मस्त है
    यार. आज मज़ा लूँगा पूरा. आ
    पास आ के बैठ". मैंने खुश
    होते हुए धीरे से कहा, "आप भी
    बहुत अच्छे हैं सर". वो बोले,
    "सच? तो फिर जो मैं बोलूंगा
    वो करेगा?" मैंने हाँ में सर
    हिलाया.

    पांच दस मिनिट बैठने के बाद
    वो उठे और बोले, "बाथरूम
    कहाँ है?" मैं उन्हें ले गया,
    तो उन्होंने वो पैकेट उठा
    लिया. मुझे लगा की उसमे क्या
    होगा? पर पूछना ठीक नहीं समझ.
    की शायद जब उनका मन होगा तो
    दे देंगे.
     
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