जिस्म की जरूरत-11

Discussion in 'Hindi Sex Stories' started by 007, Jan 30, 2018.

  1. 007

    007 Administrator Staff Member

    //krot-group.ru gaand chudai ki kahani जब मैं बैड से उठकर बाथरूम की तरफ़ जाने लगी तो विजय मेरे नंगे बदन, मटकती हुई गाँड़ और हिलते हुए मम्मों को निहार रहा था।

    *****

    अगले दिन सुबह जब मैंने विजय को नाश्ता परोस रही थी तब विजय मुस्कुराते हुए बोला, "मम्मी आज के बाद आप मेरी मुट्ठ मत मारा करना, आप चूस के ही मेरा पानी निकाला करना।"

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    मैं उसकी बात सुनकर मुस्कुरा भर दी।

    मेरा कोई उत्तर ना पाकर विजय मेरी आँखों में आँखे डालते हुए बोला, "या फ़िर आपके मम्मों के बीच में घिसकर."

    "ठीक है, जैसे चाहो वैसे कर लेना, चलो अब जल्दी से नाश्ता करो और फ़िर काम पर जाओ, नहीं तो लेट हो जाओगे।"

    लेकिन मन ही मन मेरे मन में विजय से अपनी गाँड़ मरवाने के विचार चल रहे थे। ये सोचकर ही मेरे दिल की धड़कन तेज हो रही थी, और अपने बेटे विजय के मोटे लण्ड को अपनी गाँड़ के छोटे से छेद में घुसाने का विचार आते ही मेरी चूत पनियाने लगी।

    विजय के फ़ैक्ट्री जाने के बाद मैं अपने बदन को अलमारी के आदमकद शीशे में निहारने लगी। मैंने अपने सारे कपड़े उतार दिये और अपने मम्मों को दोनों हाथों में भरकर मसलने लगी। और विजय के लण्ड के बारे में सोचते हुए अपने निप्पल मींजने लगी। और कुछ देर बाद ही मेरा एक हाथ मेरी चूत पर पहुँच गया, और उसकी उंगलियाँ मेरी चूत को सहलाने लगीं। और जब एक उँगली मेरी गीली चूत के दाने को सहलाने के बाद चूत के छेद के अंदर घुसी तो मेरी आँखें खुदबखुद बंद हो गयीं।

    शाम को जब विजय फ़ैक्ट्री से घर लौटा तो वो बहुत खुश था, उसका प्रोमोशन हो गया था, और वो सुपरवाइजर बन गया था। उसकी पगार भी दुगनी हो गयी थी। उसने आते ही खुशी से मुझे चूम लिया, मैं भी उसकी तरक्की पर खुश थी। मेरे कहने पर वो मंदिर चलने को तैयार हो गया, मंदिर से लौटते समय सिटी बस में मैं उस से चिपक कर बैठी हुई थी, वो मेरे स्पर्ष का भरपूर आनंद ले रहा था।

    सिटी बस से उतर कर जब हम दोनों घर आ रहे थे, तो मैंने विजय से कहा, "ये तुम्हारी इमानदारी और मेहनत का ही नतीजा है कि सेठ ने तुम्हे तरक्की दी है, सब ऊपर वाले की मेहर है। भगवान ने तुम्हे बरकत दी है, मैं भी आज रात तुम्हे कुछ स्पेशल चीज दूंगी।" इतना कहकर मैं कुटिलता से मुस्कुरा दी। मेरी इस मुस्कान के राज को विजय समझने का प्रयास करने लगा।

    "रात में स्पेशल. क्या दोगी मम्मी? मुँह में तो डाल ही चुका हूँ, अब बस दो ही जगह बची हैं।" इतना कहकर विजय हँसने लगा।

    "कुछ घण्टों बाद खुद ही देख लेना बेटा।"

    रात को खाना खाने के बाद जब मैं विजय के कमरे में मादरअजात नंगी दाखिल हुई तो मेरे हाथ में सरसों के तेल की शीशी थी। विजय सिर्फ़ अन्डर वियर पहने हुए बैड पर लेटा हुआ था। मुझे इस रुप में देखकर विजय के मुँह से आह निकल गयी, और उसने तुरंत अंडर वियर में से अपना लण्ड बाहर निकाल लिया। मुझे पूर्ण नग्नावस्था में देख कर विजय का लण्ड फ़नफ़ना रहा था।

    मैं विजय को और ज्यादा उत्तेजित करने के लिये अपनी गाँड़ मटकाती हुई और मम्मों को हिलाती हुई उसके पास आकर बैठ गयी।

    "अगर अपनी मम्मी की गाँड़ मारना चाहते हो तो, पहले अपने लण्ड को और मेरी गाँड़ के छेद को अच्छी तरह से चिकना कर लो, और तुम्हारा ये लण्ड मेरी गाँड़ के छोटे से छेद में आसानी से नहीं जायेगा, तो प्लीज थोड़ा आराम आराम से डालना।"

    मैंने विजय को बैड से नीचे उतरने का इशारा किया, और खुद बैड के किनारे पर बैठ गयी। विजय के लण्ड को अपने मुँह में भरकर उसको चुसने लगी, ऐसा करते हुए मेरी चूत भी पनिया रही थी। हम दोनों ही कुछ नया करने वाले थे, जो हमने पहले कभी नहीं किया था, ये एक नयी उत्तेजना पैदा कर रहा था। मैंने उसके लण्ड को पूरा नीचे से ऊपर तक अपने थूक से गीला करके चिकना कर दिया।

    हमेशा की तरह जब मैं उस के लण्ड को चूस रही थी तो उस दिन भी विजय मेरे गालों और मेरी गर्दन को अपने हाथ से सहला रहा था। लण्ड को चुसवाते हुए उसको बहुत मजा आ रहा था, और वो जब बीच बीच में मेरे चेहरे को देखता और हमारी आँखें मिल जाती तो हम दोनों मुस्कुरा देते।

    "मम्मी, आप मेरा बहुत ख्याल रखती हो, आप बहुत अच्छी हो, लेकिन क्या सच में मैं आपकी गाँड़ मार लूँ.?"

    मैंने अपनी भौहें चढाते हुए कहा, "हाँ बेटा, मार लो, लेकिन तुम ऐसा क्यों पुछ रहे हो? तुमको तो पता है कि मुझे कोई आपत्ती नहीं है, और आखिर मेरे बेटे की तरक्की हुई है, उसको कुछ इनाम तो देना ही पड़ेगा।"

    अपनी मम्मी को अपने लण्ड के सुपाड़े को चूसते हुए देखता हुआ विजय बोला, "वो तो ठीक है मम्मी, लेकिन फ़िर इस तरह जैसे मुझे रोजाना आपसे लण्ड चुसवाने की आदत पड़ गयी है, कहीं आपकी रोजाना गाँड़ मारने की आदत पड़ गयी तो? क्योंकि आपकी गाँड़ है ही इतनी मस्त कि फ़िर मैं इसको रोजाना मारे बिना नहीं रह पाऊँगा।"

    विजय की ये बात सुनकर मेरे होंठों पर मुस्कान आ गई, और मेरी गाँड़ की तारीफ़ सुनकर मेरी चूत और ज्यादा पनिया गयी, मैंने कुछ बोलने से पहले एक बार फ़िर से विजय के लण्ड को पूरा मुँह में अन्दर तक लेकर एक जोर का सड़का मार दिया।

    "अरे विजय बेटा, तुम उसकी चिन्ता मत करो, अभी जो मिल रहा है उसका फ़ायदा उठा लो, बाद का जो होगा देखा जायेगा," मैं माहौल का हल्का करने के अन्दाज में बोली।

    "ठीक है मम्मी, जो मिल रहा है उसका फ़ायदा उठा ही लेते हैं।"

    "तुम चिन्ता मत करो, अगर आदत पड़ भी गयी तो भी मुझे तुम से रोज गाँड़ मरवाने में कोई आपत्ती नहीं है, जब चाहो मार लिया करना अपनी मम्मी की गाँड़, अब तो ठीक है?"

    विजय मुझसे चिपकता हुआ बोला, "ओह मम्मी, आप बहुत अच्छी हो।"

    "मेरा अच्छा बेटा, तो फ़िर आ जाओ," मैं बैड के ऊपर चढकर घोड़ी बनते हुए, और गाँड़ को ऊपर उँचकाते हुए बोली, "ले लो अपना इनाम, और मार लो अपनी मम्मी की गाँड़।"
     
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