यह क्या कर रहा है बेटा -1

Discussion in 'Hindi Sex Stories' started by 007, Jan 9, 2018.

  1. 007

    007 Administrator Staff Member

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    रंगीन और मस्त जिंदगी की ख्वाहिश हर इंसान करता है पर सबके नसीब में मस्ती से जीना नहीं होता। यह अलग बात है कि जिंदगी में कम से कम एक बार कुछ हसीन पल जरूर आते हैं जिन्हें अगर जी लिया जाए तो तमाम जिंदगी उन हसीन पलों की खुशबू जीवन को एक सुखद एहसास दिलाती रहती है। जब भी आप अकेले होते हैं तो उन हसीन पलों को याद करके आप का तन मन महक उठता है। ऐसा ही एक किस्सा मैं आपको बताने जा रहा हूँ। बात तब की है जब मैंने अपनी पहली नौकरी ज्वाइन की थी और नांगलोई में एक अलग कमरा लेकर रहने लगा था। मुझे खाना बनाना नहीं आता था तो मुझे अब दिक्कत होने लगी थी । मैंने एक टिफिन सर्विस शुरू करवा ली पर वो खाना पसंद आने लायक नहीं था। तभी एक दिन मेरे पिता जी दिल्ली आये और एक रात के लिए मेरे पास रुके। रात को उन्होंने जब वो खाना खाया तो बहुत दुखी हुए। अगले दिन पिता जी के जाने के बाद रात को घर से फोन आया और मुझे घर पर बुलाया। मैं छुट्टी लेकर गाँव चला गया। सबने मिल कर फैसला किया कि या तो घर से कोई मेरा खाना बनाने और घर के काम के लिए मेरे साथ चला जाए या फिर कोई अच्छा इंतजाम किया जाए। पर इंतजाम क्या किया जाए? सुबह मेरी समस्या का कुछ हल निकलता महसूस हुआ। मेरी एक चाची ने मेरी माँ को कहा कि उसकी माँ बहादुरगढ़ में अकेली रहती हैं, अगर मैं उसके पास रहने लगूँ तो उसकी माँ का भी अकेलापन खत्म हो जाएगा और मेरी रोटी का भी इंतजाम हो जाएगा। नांगलोई से बहादुरगढ़ ज्यादा दूर भी नहीं था। यह सोच कर कि बुढ़िया के साथ रहना पड़ेगा मैंने मना कर दिया। पर फिर भी चाची ने जोर देकर एक बार मिलने को कहा तो मैंने चाची को कहा- आप एक बार साथ चलो, अगर पसंद आया तो रह लूँगा। चाची मेरी माँ के कहने पर तैयार हो गई। अगले ही दिन हम बहादुरगढ़ के लिए निकल लिए। पूरे रास्ते चाची अपनी माँ के बारे में ही बात करती रही। आखिर हम दोनों बहादुरगढ़ पहुँच गए। रिक्शा में बैठ कर हम दोनों चाची के घर की तरफ चल दिए। छोटी सी रिक्शा और खड्डों से भरी सड़क पर मैं चाची से बिल्कुल चिपक कर बैठा था और चाची भी हर खड्डे पर मेरी बाँह पकड़ कर मुझसे चिपक जाती। कबीर की माँ को चोदने के बाद मुझे भी अधेड़ उम्र की औरतें बहुत पसंद आने लगी थी। चाची की उम्र भी यही कोई तीस बत्तीस साल होगी। दो बच्चों की माँ थी वो पर उसके बदन के स्पर्श से मेरी पैंट के अंदर हलचल होनी शुरू हो गई थी। मैं अब अंदर ही अंदर उत्तेजित होने लगा था और मैं जानबूझ कर अपनी कोहनी से चाची की चूची को सहलाने लगा था। चाची की बड़ी बड़ी चूचियों को कोहनी से सहलाने में बहुत आनन्द आ रहा था। रिक्शा वाला मस्ती में चला जा रहा था। तभी मेरी नज़र चाची की नज़र से मिली तो चाची ने एक मादक मुस्कान देते हुए मेरी तरफ देखा। मुझे मामला पटता हुआ लगा। लगभग दस मिनट के बाद हम दोनों चाची की माँ के घर पहुँच गए। चाची की माँ को देखते ही मेरे तो होश उड़ गए। चाची की माँ एक पैंतालीस-पचास साल की बेहद खूबसूरत बदन की मालिक थी। जिसे मैं बुढ़िया समझ कर ना कर रहा था वो तो कबीर की माँ संतोष से भी ज्यादा मस्त माल थी। मेरा तो लण्ड सलामी देने लगा था उसको देखते ही। सही कहूँ तो चाची की गदराई जवानी फीकी लगने लगी थी चाची की माँ को देख कर। जल्दबाजी करने की जरुरत नहीं थी। क्यूंकि चाची भी आधी तो पट ही चुकी थी। मैं आगे बढ़ा और झुक कर चाची की माँ के पाँव छुए तो उसने मुझे अपनी छाती से लगा लिया। उनकी चूचियों का कड़ापन मुझे महसूस हुआ तो दिल किया अभी पकड़ कर मसल दूँ। चाची की माँ का नाम कमला था। हमें बैठा कर वो चाय के साथ देने के लिए नाश्ता लेने चली गई। उसके जाते ही मैं चाची के पास जाकर बैठ गया और बोला- चाची, तुम्हारी माँ तो नहीं लगती ये? चाची हँस पड़ी। "क्यों कुछ ज्यादा ही पसंद आ गई लगता है।" चाची की बात सुन कर मेरी भी हँसी छूट गई। चाची अब भी मेरी तरफ ही देखे जा रही थी कि मैंने भी जोश में आकर अपने होंठ चाची के होंठों पर रख दिए। चाची एक बारगी तो अवाक् रह गई पर फिर एकदम से मुझसे लिपट गई और मेरे होंठ चूसने लगी। मैंने भी मस्ती में चाची की चूचियाँ मसल डाली। चाची सिसकारियाँ भरने लगी थी। अभी और कुछ करने का इरादा बना ही था कि दरवाजे पर आवाज हुई और हम दोनों अलग हो गए। चाची की माँ समोसे लेकर आई थी। फिर चाय के साथ सबने समोसे खाए और फिर इधर उधर की बातें करते रहे पर मेरा दिल अब बेचैन हो गया था। मेरे पास बस आज आज का ही दिन था क्यूंकि अगले दिन तो मुझे ड्यूटी पर जाना था। मैंने चाची को अपना इरादा बता दिया था की मैं चाची को चोदना चाहता हूँ। वो भी तैयार हो गई थी। चाची ने मुझे कुछ देर इन्तजार करने को कहा। ऐसे ही बातें करते करते दोपहर हो गई। तब तक चाची की माँ भी मेरे साथ नांगलोई रहने को तैयार हो गई थी। दोपहर को मैं चाची और उसकी माँ को लेकर नांगलोई अपने कमरे पर आ गया। कमरा ज्यादा बड़ा नहीं था बस एक बेड लगा था और एक मेज कुर्सी। तभी मेरे फोन पर चाचा का फोन आया और उसने चाची को तुरंत वापिस आने को कहा। मेरे दिल के अरमान चकनाचूर हो गए थे। क्यूंकि चाची को चोदने का सपना टूट गया था। मैं बुझे दिल से चाची को वापसी की बस में बैठा कर आया। चाची का मन भी बहुत दुखी था पर फिर वो बोली- अब तो माँ तुम्हारे ही साथ रहती हैं तो जल्दी ही दुबारा आऊँगी। मैं चाची को छोड़ कर वापिस अपने कमरे पर पहुँचा तो कमरे का नक्शा ही बदला हुआ था। मेरे नए रूम पार्टनर ने कमरे को चमका दिया था। जो रसोई मैंने पिछले एक महीने से खोली भी नहीं थी वो भी अब चकाचक चमक रही थी। उसने मुझे एक लिस्ट बना कर दी सामान की। मैं कुछ ही देर में लेकर आ गया। ऐसे ही कब रात हो गई पता ही नहीं चला। अब बात आई सोने की। मेरे कमरे में तो सिर्फ एक ही बेड था। चाची की माँ ने अपना बिस्तर जमीन पर लगा लिया। मैं बेड पर लेट गया। हम दोनों ऐसे ही लेटे लेटे ही बाते करते रहे। तभी मेरे मन में एक ख्याल आया और मैंने अपना बेड एक तरफ़ खड़ा करके अपना बिस्तर चाची की माँ के बराबर में लगा लिया। "अरे क्या कर रहा है? ऊपर ही सो जाओ ना !" "नहीं नानी (चाची की माँ) . अभी तो तुमसे बहुत बातें करनी है और ऊपर से लेटे लेटे बातें करने में मज़ा नहीं आ रहा और गर्दन भी दुखने लगी है।" वो हँस पड़ी। मैं अब उसके पास ही बिस्तर लगा कर लेट गया था। बातें करते करते कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।
     
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